भारतीय अर्थव्यवस्था पर स्वदेशी का प्रभाव
सार
भारत एक प्राचीन सभ्यता और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं वाला देश माना जाता है। यहाँ की आर्थिक संरचना सदियों से आत्मनिर्भरता, स्थानीय संसाधनों के उपयोग और समुदाय-आधारित उत्पादन पर आधारित रही है। भारतीय समाज में स्वदेशी केवल आर्थिक नीति नहीं, अपितु जीवन-मूल्य और लोक-चेतना का ऐसा सिद्धांत है जो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र सभी को स्वावलंबन की ओर प्रेरित करता है। स्वदेशी का अर्थ है अपने देश में उपलब्ध साधनों, तकनीकों और श्रम से निर्मित वस्तुओं का उपयोग करना तथा विदेशी निर्भरता को न्यूनतम करना। औपनिवेशिक दौर में जब विदेशी वस्तुओं ने भारतीय बाजारों, उद्योगों और रोजगार पर गहरा प्रहार किया तब स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय जनता के भीतर आर्थिक स्वाभिमान का दीप पुनः प्रज्वलित किया। महात्मा गांधी ने चरखे और खादी को स्वदेशी का प्रतीक बनाकर यह संदेश दिया कि श्राष्ट्र की वास्तविक उन्नति तभी संभव है जब जनता आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होश्। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात उदारीकरण और वैश्वीकरण के प्रभाव से विदेशी उत्पादों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रवाह बढ़ा, जिससे स्थानीय कुटीर और लघु उद्योग चुनौतियों का सामना करते रहे।
किन्तु आज परिस्थितियाँ पुनः बदल रही हैं। आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया और वोकल फॉर लोकल जैसे अभियानों ने स्वदेशी को आधुनिक आर्थिक विकास के केंद्र में स्थापित कर दिया है। स्वदेशी विचारधारा न केवल स्थानीय उत्पादन और रोजगार को सशक्त बनाती है यद्धपि यह संस्कृति, परंपरा और पर्यावरणीय संतुलन की रक्षा भी करती है।
