भारतीय चित्रकला का शास्त्रीय विश्लेषण
Abstract
चित्रकला का अर्थ शिल्प कौशल की प्रक्रिया से युक्त सुंदर एवं सुखद सृजन है। कला हृदय को आनंद की अनुभूति कराती है। “भारतीय दर्शन में कला को सत्यम शिवम सुंदरम रूप में माना गया है।”[1] प्रकृति के प्रति रचना तथा जीवन के प्रत्येक क्रियाकलाप में कला दृष्टिगोचर होती है, यह जीवन का अनुपम और अमूल्य अंग है।
संपूर्ण जगत में मनुष्य आनंद स्वरूप आत्मा का सबसे श्रेष्ठतम अंश है। यही कारण है कि मनुष्य का समस्त क्रियाकलाप आनंद अनुभूति के लिए ही होता है। आनंद अधिगम के लिए उदभोत अनेक पदार्थ में ललित कलाओं का महत्व सहृदय समाज मे छिपा हुआ नहीं है। सभी कलाएँ अपने आप को श्रेष्ठ करने का प्रयास करती रहती हैं, किंतु प्रथम दृष्टि आँखों पर तत्काल प्रभाव डालने वाली कोई चीज है, तो वह चित्र या रेखाएँ ही हैं, जो चक्षुओं को तुरंत आकर्षित करते हैं। भाषा की उत्पत्ति से पूर्व इन चित्रों ने ही सम्प्रेषण का कार्य किया। “मनुष्य की कृति जो आनंद प्रदान करती हो, वह कला है।”कला का उद्भव प्रागैतिहासिक काल से माना जाता है। प्रागैतिहासिक गुफाओं से प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्य इसी तथ्यों की पुष्टि करते हैं। मनुष्य के जन्म के साथ ही उसके भीतर संप्रेषण की प्रवृत्ति थी। अपनी भावनाओं के संप्रेषण हेतु प्रारंभिक मानव ने रेखांकन को इसका माध्यम बनाया।
